मोतियाबिंद को गंभीर अवस्था में ना पहुंचने दें। अपनी आंखों को बचाएं

मोतियाबिंद को गंभीर अवस्था में ना पहुंचने दें। अपनी आंखों को बचाएं

क्या आपको ऐसा महसूस हो रहा है कि आपको चीजें धुंधली दिखाई दे रही हैं?, क्या आपको ऐसा लगता है कि जो चीजें आपको पहले स्पष्ट रूप से दिखाई पड़ती थीं, वही अब थोड़ी धुंधला दिखाई दे रही है? अगर सही में आप ऐसा ही महसूस कर रहे हैं तो यह मोतियाबिंद का लक्षण हो सकता है!
आंखों में कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं। इन्हीं बीमारियों में से एक मोतियाबिंद है। इसमें आंख में एक ऐसी स्थिति आती है जिसमें आंखों के लेंस में बदलाव होने लगता है और इससे देखने की क्षमता में कमी होने लगती है। सामान्यतः जब लोगों की उम्र बढ़ने लगती है तो मोतियाबिंद होने की संभावना बन जाती है। मोतियाबिंद की बीमारी धीरे-धीरे विकसित होती है। इसके अलावा अगर किसी व्यक्ति को डायबिटीज (मधुमेह) या हाई ब्लडप्रेशर (उच्च रक्तचाप) जैसी बीमारी है तो इससे भी उन्हें मोतियाबिंद रोग हो सकता है।

मोतियाबिंद के कुछ सामान्य लक्षणों ये हो सकते हैंः-

  • चश्मे के नंबर में बार-बार परिवर्तन होना
  • चीजें धुंधली दिखाई देना
  • आंखों के सामने रोशनी का चमकना
  • रात के समय देखने में परेशानी होना
  • आंखों के आगे रोशनी का फैलना

मोतियाबिंद की बीमारी निम्न प्रकार की होती है जिनसे रोगी ग्रस्त हो सकते हैंः-

इमैच्यौर: यह मोतियाबिंद का शुरुआती चरण होता है। इस दौरान आंखों के लेंस का एक छोटे से भाग पर उजली सी परत जम जाती है जिससे देखने में थोड़ी परेशानी होने लगती है। अधिकांश लोग इस लक्षण पर अधिक गौर नहीं करते। सच यह है कि लोगों को यह अंदाजा ही नहीं होता कि उनको यह परेशानी मोतियाबिंद के कारण हो रही है।

मैच्यौर: जब शुरुआती संकेतों को नजरअंदाज कर दिया जाता है, तो मोतियाबिंद की बीमारी एक ऐसे चरण में पहुंच जाती है जहां आंखों के आगे बादल जैसी चीज स्थाई रूप से जम जाती है। यह चीज अपारदर्शी होती है और इससे रोगियों की आंखों की रोशनी कम होने लगती है। उन्हें देखने में दिक्कत होने लगती है। इस अवस्था में रोजमर्रा की दिनचर्या प्रभावित होने लगती है।

हाइपरमैच्योर: यह बीमारी की बहुत ही गंभीर स्थिति होती है जिसमें आंखों से पानी बहना शुरू हो जाता है। आंखें सूज जाती हैं। रिसाव के कारण आंखों के लेंस छोटे और झुर्रियों वाले हो जाते हैं। ऐसी स्थिति में सूजन के कारण आंख में दर्द होने की शिकायत भी रहती है। इस अवस्था में सर्जरी के दौरान जटिलताओं का सामना करना पड़ता है। डॉक्टर के अनुसार, मोतियाबिंद की बीमारी का समय पर इलाज नहीं कराया गया तो यह गंभीर बन जाता है।

मोतियाबिंद को अति गंभीर अवस्था तक नहीं पहुंचने देंं

असल बात यह है कि मोतियाबिंद की बीमारी हो जाए तो उसे टालना ही नहीं चाहिए क्योंकि इससे बीमारी बहुत गंभीर स्थिति तक पहुंच सकती है। वर्तमान में अनेक ऐसी तकनीक मौजूद हैं जिनकी सहायता से मोतियाबिंद का शुरुआती अवस्था में ही इलाज हो सकता है और इसे आंखों के लेंस के आगे से आसानी से हटाया जा सकता है।

जब कोई रोगी मोतियाबिंद की बीमारी का समय पर इलाज नहीं करा पाता है तो वह बहुत गंभीर स्थिति में पहुंच जाती है। ऐसी स्थिति में आंखों के लेंस के आगे पड़ी उजली परत को हटाने में सर्जन को बहुत मुश्किल होती है और इसमें जटिलताओं का सामाना भी करना पड़ता है।
दरअसल शुरुआती चरण में मोतियाबिंद का जब इलाज कराया जाता है तो आंखों के लेंस के आगे के परत को टे टुकड़ों में करके निकालने के लिए अल्ट्रासाउंड और लेजर का उपयोग कम ही किया जाता है। इस समय बीमारी वाली परत मुलायम होती है, इसलिए इसे हटाने में आसानी होती है। जब बीमारी बहुत गंभीर स्थिति में पहुंच जाती है तो आंखों के सामंने वाली परत कठोर हो जाता है। इसलिए सर्जरी के दौरान जटिलताओं का सामना करना पड़ता है।

इसलिए ऐसी स्थिति से बचने के लिए मोतियाबिंद की सर्जरी को टालना नहीं चाहिए बल्कि जैसे ही रोगी को यह एहसास हो कि उसे देखने में दिक्कत हो रही है तो उसे तुरंत अपनी आंखों की जांच करानी चाहिए। आंखों की जांच कराने के बाद अगर उसे मोतियाबिंद होने का पता चले तो बिना देर किए मोतियाबिंद का इलाज कराना चाहिए। वास्तव में जब बीमारी शुरुआती अवस्था में होती है तो इसका इलाज करना आसान हो जाता है और सर्जरी के बाद रिकवरी में भी आसानी होती है।

मोतियाबिंद की सर्जरी इन तरीकों से की जाती हैः-

मोतियाबिंद की सर्जरी अनेक प्रकार से की जाती है। मरीज का इलाज किस पद्धति या तकनीक से किया जाना है यह मरीज के आंखों के स्वास्थ्य, तकनीक की उपलब्धता और सर्जन की विशेषज्ञता आदि बातों पर निर्भर करता है।

फेको इमल्सीफिकेशन:

इस प्रक्रिया द्वारा मोतियाबिंद का इलाज बहुत सालों से किया जा रहा है। इस विधि में एक छोटे से चीरा के माध्यम से बीमारी का इलाज किया जाता है। इसमें किसी तरह का टॉका लगाने की जरूरत नहीं पड़ती है। यह एक सुरक्षित प्रक्रिया है और इसमें रोगी जल्दी ठीक होता है।

माइक्रो-इंसिजन कैटेरेक्ट (मोतियाबिंद) सर्जरी (MICS):

इस तकनीक में मोतियाबिंद का इलाज छोटा चीरा लगाकर किया जाता है। चीरे का आकार लगभभग 1.8 मिमी से 2.2 मिमी हो सकता है। इस चीरे के माध्यम से आंखों के लेंस के आगे की परत को हटाया जाता है। इसमें भी टॉका या इंजेक्शन की जरूरत नहीं पड़ती है। वास्तव में यह एक उन्नत प्रोसीजर है जिससे आंखों की रोशनी सही हो जाती है और रिकवरी का समय कम से कम 4-7 दिनों का होता है।

एडवांस्ड ब्लेड फ्री रोबोटिक-असिस्टैड कैटेरेक्ट (मोतियाबिंद) सर्जरी:

इसमें लेजर तकनीक द्वारा मोतियाबिंद का इलाज किया जाता है और इसे मोतियाबिंद के इलाज के लिए सबसे उन्नत तकनीक के रूप में जाना जाता है। इसकी खास विशेषताएं यह हैं कि यह 3डी मैपिंग द्वारा सर्जन को रोगी की आवश्यकता के अनुसार सर्जरी करने की सुविधा देता है। इसमें किसी तरह के ब्लेड और या इंजेक्शन की जरूरत नहीं पड़ती और यह बहुत ही सुरक्षित प्रक्रिया माना जाता है। अन्य सर्जरी प्रक्रिया की तुलना में इसकी रिकवरी समय बहुत कम होती है।

मोतियाबिंद की सर्जरी बहुत ही सामान्य और दर्द रहित सर्जरी होती है।

अधिकांश लोग सर्जरी के नाम से डरते हैं। यदि आप भी मोतियाबिंद से ग्रस्त हैं और सर्जरी के नाम से बीमारी का इलाज कराने से पीछे हट रहे हैं तो आपको ऐसा नहीं करना चाहिए। इससे आप अपनी आंखों की रोशनी को हमेशा के लिए खो सकते हैैं।

अगर आप सर्जरी की प्रक्रिया से डर रहे हैं तो समझने वाली बात यह है कि मोतियाबिंद हटाने की प्रक्रिया बहुत ही आसान होती है।यह भारत में की जाने वाली सबसे आम सर्जरी है जिसका परिणाम प्रायः सुरक्षित ही होता है। वर्तमान में तकनीकों के विकसित होने के कारण आंखों के लेंस को बदलने की प्रक्रिया में बहुत कम समय लगता है और जटिलताएं कम होती हैं।

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